
कर्णप्रयाग। लोक निर्माण विभाग की लापरवाही से दस से अधिक गांवों को जोड़ने वाला जर्जर जिलासू झूला पुल अनहोनी का कारण बन सकता है।
वर्ष 1971 में तहसील मुख्यालय से करीब छह किमी दूर जिलासू में झूला पुल का निर्माण किया गया था। इस पुल के बनने से अलकनंदा नदी के दूसरे छोर पर बसे जिलासू, झिरकोटी, सरणा, एरास, कोल्डा, गिरसा, ऑली-कांडई, उतरसू, मस्ट गांव, बगड़ आदि गांवों की करीब तीन हजार से अधिक आबादी को लाभ मिला। कुछ ही वर्षों में पुल देखरेख के अभाव में बदहाल होने लगा। पुल का डामर कई स्थानों पर उखड़ा है। दो स्थानों टिन की चादर भी पूरी तरह से सड़ चुकी है। विभाग ने मरम्मत के बजाय इन स्थानों पर टिन की चादर डालकर पत्थरों से ढका है। जिलासू के पूर्व प्रधान पुरुषोत्तम बहुगुणा, गिरसा के जितेंद्र पंवार का कहना है कि विभाग को अवगत कराने के बाद भी झूला पुल की सुध नहीं ली जा रही है।
जर्जर पुलों के सहारे आर-पार हो रही जिंदगी
अलकनंदा नदी पर सिवाईं, बमौथ और पिंडर नदी पर सिमली में निर्मित झूला पुल भी खस्ताहाल बने हैं। इन जर्जर पुलों से प्रतिदिन दर्जनों गांवों के लोग जान हथेली पर रखकर आवागमन को मजबूर हैं। 10 अक्तूबर को नलगांव में जर्जर झूला पुल टूट चुका है, जिसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।
इंसेट
कब बनेगा मोटर पुल
पोखरी क्षेत्र के 20 गांवों के लिए वर्ष 2008 में स्वीकृत 10 किमी जिलासू-गिरसा-ऑली-कांडई मार्ग के किमी एक पर मोटर पुल की स्वीकृति मिली। इसके लिए बांड भी हो चुका है। पांच वर्ष बाद भी 120 मीटर स्पान का पुल नहीं बन पाया है। जबकि साढ़े पांच करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।
कोट-
झूला पुल की मरम्मत जल्द की जाएगी। जहां पर टिन गल गई है। नई टिन बिछाने के साथ ऊपर से डामर कर दिया जाएगा। समीप ही निर्माणाधीन मोटर पुल भी मार्च माह तक पूरा कर लिया जाएगा।
– जेएन पटवाल सहायक अभियंता लोनिवि गौचर
